केंद्रीय कैबिनेट ने आज काशी को एक साथ दो विशाल इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं की सौगात दी है — और इन दोनों की कुल लागत है ₹25,445 करोड़ रुपये से भी ज्यादा। लेकिन जब इतना बड़ा ऐलान होता है, तो एक पत्रकार का धर्म है कि वो जश्न से पहले सवाल पूछे।
तो आइए, दोनों परियोजनाओं को समझें — और फिर वो सवाल भी करें जो बनारस की गलियों में बैठा आम आदमी पूछ रहा है।
परियोजना 1 — 46 किमी का 6-लेन ग्रीनफील्ड एलिवेटेड कॉरिडोर: ₹14,447 करोड़
पहली परियोजना है नेशनल हाईवे-19 और वाराणसी रिंग रोड के बीच एक नया 6-लेन ग्रीनफील्ड एलिवेटेड कॉरिडोर, जिसकी कुल लंबाई होगी 46.039 किलोमीटर।
यह कॉरिडोर वाराणसी के बाहरी क्षेत्र से शहर के भीतरी हिस्से तक एक सीधा, बाधारहित मार्ग बनाएगा। सरकार का दावा है कि इसके बनने के बाद इस क्षेत्र में औसत यात्रा समय 60 मिनट से घटकर महज 20 मिनट रह जाएगा — यानी 40 मिनट की सीधी बचत।
काशी विश्वनाथ धाम, BHU, घाट, प्रमुख शिक्षण संस्थान — इन सबसे संपर्क पहले से कहीं आसान हो जाएगा। और जब लाखों श्रद्धालु और पर्यटक वाराणसी आते हैं, तो उनका अनुभव बेहतर होगा — जो शहर की अर्थव्यवस्था के लिए भी वरदान साबित होगा।
परियोजना 2 — वरुणा के किनारे 43.2 किमी का एलिवेटेड कॉरिडोर: ₹10,998 करोड़
दूसरी परियोजना और भी दिलचस्प है। वरुणा नदी के किनारे बनेगा 43.218 किलोमीटर लंबा 6/4-लेन एलिवेटेड कॉरिडोर — जो NH-31 को सीधे वाराणसी रिंग रोड से जोड़ेगा।
लेकिन इसका सबसे बड़ा फायदा सिर्फ यात्री नहीं उठाएंगे।
यह कॉरिडोर NH-31 से काशी रेलवे स्टेशन के बीच यात्रा समय को 40 मिनट से घटाकर 20 मिनट करेगा। यानी 50% की कमी। और यह रूट चंदौली सोशल इकोनॉमिक जोन तथा 6 बड़े लॉजिस्टिक्स नोड्स से भी जुड़ेगा — जिसका मतलब है कि यह सिर्फ यात्री परियोजना नहीं, यह एक आर्थिक विकास का राजमार्ग है।
वाराणसी की असली समस्या — जो नंबरों में नहीं दिखती
वाराणसी में ट्रैफिक जाम कोई नई बात नहीं है।
लंका चौराहा, गोदौलिया, मैदागिन, रथयात्रा — इन इलाकों में घंटों जाम एक सामान्य दृश्य है। BHU से सिगरा तक जाने में कभी-कभी डेढ़ घंटा लग जाता है। ऑटो, ई-रिक्शा, बाइक, ट्रक — सब एक ही सड़क पर। और उसी सड़क पर चलते हैं पैदल श्रद्धालु, साइकिल रिक्शा और गाय।
एलिवेटेड कॉरिडोर इस जाम को सतह पर नहीं हटाएगा — बल्कि एक नया layer बनाएगा जिससे शहर से गुजरने वाला ट्रैफिक ऊपर से निकल जाए और नीचे की सड़कें थोड़ी सांस ले सकें।
यह सोच सही है। लेकिन काफी नहीं।
तीन सवाल जो हर वाराणसीवासी के मन में हैं
पहला सवाल — निर्माण के दौरान क्या होगा?
वाराणसी की सड़कें पहले से संकरी हैं। एलिवेटेड कॉरिडोर के निर्माण के दौरान — जो वर्षों तक चलेगा — ट्रैफिक और भी बदतर हो जाएगा। मेट्रो निर्माण के दौरान दिल्ली और लखनऊ ने यह दर्द झेला है। वाराणसी के लिए इस दर्द का management plan क्या होगा?
दूसरा सवाल — HAM मॉडल और देरी का इतिहास
दोनों परियोजनाएं Hybrid Annuity Model (HAM) पर बनेंगी। HAM में सरकार 40% खर्च निर्माण के दौरान देती है और 60% बाद में। यह मॉडल अच्छा है — लेकिन भारत में बड़े हाईवे प्रोजेक्ट्स में देरी और लागत बढ़ने का इतिहास है। क्या इन परियोजनाओं की समयसीमा और लागत नियंत्रण के लिए कोई विशेष निगरानी तंत्र होगा?
तीसरा सवाल — गलियों का क्या?
वाराणसी की आत्मा उसकी गलियों में बसती है — वो गलियां जहां एलिवेटेड कॉरिडोर नहीं पहुंचेगा। गोदौलिया से विश्वनाथ मंदिर तक, अस्सी घाट से दशाश्वमेध तक — इन गलियों में ट्रैफिक की समस्या बड़ी सड़कों से भी पुरानी और गहरी है। क्या इन गलियों के लिए कोई समांतर योजना है?
फिर भी — यह शुरुआत ऐतिहासिक है
सवाल उठाना जरूरी है। लेकिन सच्चाई यह भी है कि ₹25,000 करोड़ से ज्यादा का निवेश एक ही शहर के लिए — यह असाधारण है।
वाराणसी पहले से बदल रहा है। काशी विश्वनाथ कॉरिडोर, रोपवे, रिंग रोड — और अब यह दो मेगा एलिवेटेड कॉरिडोर। अगले 5-7 साल में जो वाराणसी बनेगा, वो 2015 के वाराणसी से बिल्कुल अलग होगा।
पर्यटन बढ़ेगा। व्यापार बढ़ेगा। रोजगार बढ़ेगा। चंदौली और आसपास के जिले भी इस विकास का हिस्सा बनेंगे।
काशी सिर्फ मंदिरों और घाटों का शहर नहीं रहेगा — यह उत्तर भारत का एक प्रमुख logistics और economic hub भी बनेगा।
