वाराणसी, 28 फरवरी 2026। मेडीवैस फाउंडेशन एवं ओसवी हेल्थकेयर द्वारा आयोजित शी शील्ड कॉन्क्लेव 2.0 का भव्य आयोजन शनिवार को ताज गंगेज के सभागार में संपन्न हुआ। “क्लाइमेट चेंज एंड विमेंस हेल्थ” विषय पर आधारित इस राष्ट्रीय संवाद का केंद्रीय विषय था — “पर्यावरणीय चुनौतियों के बीच महिला स्वास्थ्य के भविष्य का निर्माण।”
देशभर से आए विशेषज्ञों, नीति-निर्माताओं, चिकित्सकों, प्रशासनिक अधिकारियों एवं सामाजिक चिंतकों की गरिमामयी उपस्थिति में आयोजित इस सम्मेलन में जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण और महिला स्वास्थ्य के परस्पर संबंधों पर गंभीर एवं व्यापक मंथन किया गया।
उद्घाटन सत्र: संतुलन, संवेदना और संस्कार का संदेश
मुख्य अतिथि पद्मश्री नलिनी अस्थाना ने अपने प्रेरक उद्बोधन में कहा कि जीवन में “सुर, ताल और लय” जितनी सुसंगत होगी, समाज और परिवार उतना ही सुंदर और संतुलित बनेगा। उन्होंने प्रकृति के संतुलन और नारी सम्मान को सामाजिक स्थिरता से जोड़ते हुए कहा — “नारी सुरक्षित है तो समाज सुरक्षित है।” उन्होंने विकास और संसाधनों के उपयोग में संतुलन बनाए रखने की आवश्यकता पर भी बल दिया।
विशिष्ट अतिथि डॉ. एच.पी. माथुर (चेयरपर्सन, उत्कर्ष वेलफेयर) ने प्रदूषण को “धीमा जहर” बताते हुए इसे पीढ़ी दर पीढ़ी स्वास्थ्य के लिए घातक बताया। उन्होंने महिला सशक्तिकरण हेतु वित्तीय साक्षरता और औद्योगिक मानकों के सख्त अनुपालन की आवश्यकता रेखांकित की।
मुख्य वक्ता गिरिधर जे. ज्ञानी (महानिदेशक, एसोसिएशन ऑफ हेल्थकेयर प्रोवाइडर्स इंडिया) ने “रीबिल्डिंग हेल्थ इंडिया स्ट्रक्चर फॉर विमेन” विषय पर बोलते हुए सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज (यूएचसी) पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानकों के अनुसार भारत में लगभग 40 लाख अस्पताल बेड होने चाहिए, जबकि वर्तमान में लगभग 21 लाख ही उपलब्ध हैं, जो स्वास्थ्य अवसंरचना की चुनौतियों को दर्शाता है।
प्रथम सत्र: अदृश्य खतरे और मौन महामारी
“इनविज़िबल थ्रेट्स – हाउ पॉल्यूशन, क्लाइमेट एंड केमिकल्स आर क्रिएटिंग ए साइलेंट विमेन हेल्थ एपिडेमिक” विषयक सत्र की अध्यक्षता प्रो. जे.पी. लाल (कुलाधिपति, सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ झारखंड) ने की।
डॉ. शिप्रा धर श्रीवास्तव ने बताया कि ओपीडी में आने वाले लगभग 70 प्रतिशत मरीज महिलाएं होती हैं, जो परिवार को प्राथमिकता देते हुए अक्सर अपने स्वास्थ्य की अनदेखी करती हैं।
डॉ. देवेश यादव ने जंक फूड और पैकेट फूड को “समाज का खलनायक” बताते हुए जलवायु परिवर्तन को नई बीमारियों का कारण बताया।
डॉ. संजीव सिंह ने सकारात्मक व्यवहार परिवर्तन को स्वास्थ्य सुधार की कुंजी कहा।
अध्यक्षीय संबोधन में प्रो. लाल ने कहा — “यदि महिला बीमार पड़ती है तो पूरा परिवार प्रभावित होता है।” उन्होंने प्रत्येक घर को “हरित घर” बनाने और प्लास्टिक उपयोग कम करने का आह्वान किया। पद्मश्री चंद्रशेखर सिंह ने प्राकृतिक खेती और खाद्य मानकों के कड़ाई से पालन पर बल दिया।
द्वितीय सत्र: जलवायु बोझ और स्वास्थ्य असमानता
“विमेन ऑन द फ्रंटलाइन – क्लाइमेट बर्डन, लाइवलीहुड स्ट्रेस एंड हेल्थ इनइक्वालिटी” सत्र की अध्यक्षता सुश्री उर्वशी मित्तल ने की। उन्होंने प्लास्टिक मुक्त समाज की दिशा में ठोस कदम उठाने की आवश्यकता बताई।
सुश्री मोनिका खरे ने कहा कि जलवायु संकट का सर्वाधिक प्रभाव ग्रामीण एवं निम्न आय वर्ग की महिलाओं पर पड़ता है।
सुश्री कनिका सिंघल ने महिलाओं को नीति-निर्माण प्रक्रिया में सक्रिय भागीदारी देने पर बल दिया।
मुख्य वक्ता के रूप में उपस्थित आलोक वर्मा (अपर जिलाधिकारी, वाराणसी) ने बताया कि प्रशासनिक स्तर पर स्वच्छता अभियान और पोषण कार्यक्रमों के माध्यम से पर्यावरण संरक्षण एवं महिला स्वास्थ्य के लिए समन्वित प्रयास किए जा रहे हैं।
विशेषज्ञों ने एक स्वर में कहा कि प्रदूषण, रसायनों का अंधाधुंध प्रयोग और जलवायु परिवर्तन मिलकर महिलाओं के स्वास्थ्य के लिए “मौन महामारी” का रूप ले रहे हैं।
तृतीय सत्र: उद्योग की भूमिका और ईएसजी
“ईएसजी फॉर हर – हाउ इंडस्ट्री कैन रिड्यूस पॉल्यूशन एंड ट्रांसफॉर्म विमेन हेल्थ” सत्र में उद्योग जगत की जिम्मेदारी पर चर्चा हुई।
सुश्री निधि बंसल ने कहा कि जब महिलाएं निर्णय प्रक्रिया के केंद्र में होंगी, तभी नीतियां और उद्योग अधिक संवेदनशील बनेंगे।
श्री रमेश नायर ने कॉरपोरेट क्षेत्र से ईएसजी मानकों को सामाजिक दायित्व के रूप में अपनाने का आह्वान किया।
मुदित कुमार सिंह (आईएफएस) ने ग्रामीण विकास और पर्यावरण संरक्षण को एक-दूसरे का पूरक बताया।
डॉ. अंकुर मुतरे ने प्रदूषण के महिलाओं के प्रजनन एवं हार्मोनल स्वास्थ्य पर प्रभावों को रेखांकित किया।
डॉ. संदीप ठाकर ने निवारक स्वास्थ्य सेवाओं और पर्यावरणीय जिम्मेदारी के त्रिपक्षीय सहयोग (उद्योग-सरकार-समाज) को महिला स्वास्थ्य सुधार की कुंजी बताया।
स्वस्थ भविष्य का संकल्प
शी शील्ड कॉन्क्लेव 2.0 ने स्पष्ट संदेश दिया कि —
यदि महिला स्वस्थ है तो परिवार, समाज और राष्ट्र स्वस्थ है, और इस संतुलन के केंद्र में पर्यावरणीय सुरक्षा है।
यह राष्ट्रीय संवाद केवल विचार-विमर्श नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए स्वस्थ, समान और टिकाऊ भविष्य के निर्माण का संकल्प है।
कार्यक्रम में औरिक सेन गुप्ता, मृणाल कांत पाण्डेय, डॉ. प्रखर सिंह, बृजेश श्रीवास्तव, अनुराग, डॉ. मनीष गुप्ता तथा शोध छात्र रंजीत कुमार राय सहित लगभग 300 प्रतिभागियों की उपस्थिति रही।
