काशी बदल रही है। और इस बार बदलाव जमीन से नहीं, हवा से आ रहा है।
उत्तर प्रदेश सरकार ने वाराणसी के बहुप्रतीक्षित अर्बन रोपवे का किराया आधिकारिक रूप से अधिसूचित कर दिया है। कैंट रेलवे स्टेशन से गोदौलिया तक का अधिकतम किराया ₹50 तय हुआ है, न्यूनतम ₹10। कागजों पर यह किफायती और प्रगतिशील दिखता है। लेकिन जब हम इस परियोजना की गहराई में उतरते हैं, तो कुछ ऐसे सवाल उभरते हैं जिन पर बात होनी चाहिए।
पहले तथ्यों की बात
3.75 किलोमीटर के इस रोपवे पर चार स्टेशन हैं — कैंट, काशी विद्यापीठ, रथयात्रा और गोदौलिया। सफर का समय महज 16 मिनट। तुलना करें तो इसी दूरी को सड़क मार्ग से तय करने में आज के ट्रैफिक में करीब 45 मिनट लग जाते हैं। यानी प्रतिदिन लगभग आधा घंटा बचत — उन लोगों के लिए जो इसका इस्तेमाल करेंगे।
₹2,000 में एक पूरा गंडोला बुक होगा, जिसमें 10 लोग एक साथ सफर कर सकते हैं — यह स्कूल ट्रिप, टूरिस्ट ग्रुप और कॉर्पोरेट विजिट के लिए दिलचस्प विकल्प है। एडवांस बुकिंग पर ₹1,200 में यही सुविधा मिलेगी — सीधे ₹800 की बचत।
‘काशी स्मार्ट पास’ वाले नियमित यात्रियों को 20% की छूट मिलेगी। यानी रोज यात्रा करने वाले बनारसी के लिए ₹50 की जगह ₹40 — जो एक ऑटो किराये से भी कम है।
तो फिर सवाल क्या है?
सवाल किराये का नहीं, आदत का है।
बनारस वो शहर है जहाँ लोग गलियों में चलना पसंद करते हैं। जहाँ टेम्पो और ई-रिक्शा की जड़ें इतनी गहरी हैं कि हर मोड़ पर एक नया रूट मिल जाता है। रोपवे का रूट फिक्स्ड है — कैंट से गोदौलिया। लेकिन असली बनारस तो उन पतली गलियों में बसता है जहाँ रोपवे का गंडोला कभी नहीं पहुँचेगा।
ऐसे में यह परियोजना मुख्यतः दो तरह के लोगों के काम आएगी — पर्यटक जो ऊपर से काशी देखना चाहते हैं, और वो नियमित यात्री जो कैंट से गोदौलिया के बीच प्रतिदिन आते-जाते हैं।
हर साल 5% किराया बढ़ेगा — यह छोटी बात नहीं है
अधिसूचना में साफ लिखा है कि हर साल 1 अप्रैल से किराये में 5% की वृद्धि होगी। आज का ₹50 पाँच साल बाद लगभग ₹64 हो जाएगा। दस साल बाद करीब ₹81। यह वृद्धि दर सामान्य मुद्रास्फीति से ज्यादा है।
सवाल यह है — क्या ‘काशी स्मार्ट पास’ की 20% छूट भी हर साल उसी दर से बढ़ेगी? या छूट फिक्स रहेगी और असली भार आम यात्री पर आता रहेगा? यह स्पष्ट नहीं है।
जो अच्छा है, उसे स्वीकारना जरूरी है
इस विश्लेषण का मतलब परियोजना को नकारना नहीं है। दिव्यांगजनों और वरिष्ठ नागरिकों के लिए लिफ्ट, एस्केलेटर और 24 घंटे CCTV — यह सच में सराहनीय है। कैंट स्टेशन पर 2 घंटे निशुल्क क्लॉक रूम की सुविधा उन यात्रियों के लिए बड़ी राहत है जो ट्रेन पकड़ने से पहले शहर घूमना चाहते हैं।
और सबसे बड़ी बात — अगर यह परियोजना सफल रही, तो लक्सा, रथयात्रा और गोदौलिया जैसे भीड़भरे मार्गों पर ट्रैफिक का दबाव सच में कम होगा। वाराणसी के पर्यावरण के लिए भी यह बेहतर है।
उड़ान अच्छी है, पर जमीन मत भूलिए
वाराणसी रोपवे देश की पहली अर्बन पब्लिक ट्रांसपोर्ट रोपवे प्रणाली है — यह गर्व की बात है। ₹50 का किराया तर्कसंगत है। लेकिन इस परियोजना की असली सफलता तब होगी जब आम बनारसी — मजदूर, छात्र, दुकानदार — इसे अपना समझे, सिर्फ पर्यटकों का साधन नहीं।
सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि स्मार्ट पास सुलभ हो, किराया बढ़ोतरी संवेदनशील हो, और रोपवे सिर्फ एक ‘शोकेस प्रोजेक्ट’ बनकर न रह जाए।
काशी आकाश से खूबसूरत दिखती है — लेकिन काशी की असली पहचान उसकी गलियों में है।
