नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के नए इक्विटी एवं भेदभाव-रोधी नियमों के क्रियान्वयन पर अंतरिम रोक लगा दी। इन नियमों को चुनौती देने वाली जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान अदालत ने कड़ी टिप्पणियां करते हुए कहा कि आजादी के 75 साल बाद भी हम समाज को जातिगत पहचान से मुक्त नहीं कर सके हैं, ऐसे में यह सवाल उठता है कि क्या नया कानून समानता की दिशा में आगे ले जाएगा या समाज को पीछे की ओर धकेल देगा।
CJI की तीखी टिप्पणी
सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश भारत ने कहा कि किसी भी कानून का उद्देश्य भले ही सकारात्मक हो, लेकिन दुरुपयोग की संभावना को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। अदालत ने आगाह किया कि अस्पष्ट और व्यापक प्रावधान विश्वविद्यालयों में भय और अनिश्चितता का माहौल पैदा कर सकते हैं।
“बराबरी की मंशा जरूरी है, लेकिन ऐसे नियम नहीं होने चाहिए जो नई तरह की असमानता या टकराव को जन्म दें,”—पीठ ने टिप्पणी की।
याचिकाकर्ताओं की दलील
याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि UGC के नए नियम अस्पष्ट, अत्यधिक व्यापक और व्याख्या पर निर्भर हैं, जिससे झूठी शिकायतें, उत्पीड़न और अकादमिक स्वतंत्रता पर असर पड़ सकता है। उनका कहना था कि नियमों के चलते शिक्षण संस्थानों की स्वायत्तता भी प्रभावित हो सकती है।
इन दलीलों पर विचार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने नियमों के अमल पर रोक लगाना उचित समझा, जब तक कि मामले की विस्तृत सुनवाई न हो जाए।
संतुलन पर जोर
अदालत ने स्पष्ट किया कि भेदभाव खत्म करना अनिवार्य है, लेकिन इसके लिए बनाया गया ढांचा संतुलित, स्पष्ट और दुरुपयोग-रोधी होना चाहिए। कानून ऐसा हो जो समानता को मज़बूत करे, न कि नई समस्याएं पैदा करे।
आगे क्या?
अंतरिम रोक के चलते फिलहाल UGC नए इक्विटी नियम लागू नहीं कर सकेगा। सुप्रीम कोर्ट आगे की सुनवाई में यह परखेगा कि ये नियम संविधान के समानता, न्याय और गैर-भेदभाव के सिद्धांतों के अनुरूप हैं या नहीं।
यह मामला देशभर के विश्वविद्यालयों, छात्रों, शिक्षकों और नीति-निर्माताओं के लिए बेहद अहम माना जा रहा है, क्योंकि अंतिम फैसले का असर उच्च शिक्षा में भेदभाव-रोधी नीतियों की दिशा और स्वरूप तय कर सकता है।
