बरेली/वाराणसी। बरेली के सिटी मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री के इस्तीफे ने प्रशासनिक गलियारों से लेकर शैक्षणिक और धार्मिक जगत तक व्यापक बहस छेड़ दी है। 2016 बैच के पीसीएस अधिकारी अलंकार अग्निहोत्री ने यूजीसी के नए कानून के विरोध और प्रयागराज में माघ मेले के दौरान स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के शिष्यों के साथ हुई कथित मारपीट की घटना से आहत होकर अपने पद से इस्तीफा दे दिया।
इस्तीफे में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (BHU) का उल्लेख सामने आने के बाद यह मामला और भी चर्चा में आ गया है। गणतंत्र दिवस के आसपास BHU परिसर में इस विषय को लेकर हलचल और विमर्श देखे गए।
माघ मेले की घटना से गहरा आघात
अलंकार अग्निहोत्री ने अपने पत्र में लिखा कि 2026 के माघ मेले के दौरान मौनी अमावस्या स्नान के समय प्रयागराज में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद और उनके शिष्यों के साथ स्थानीय प्रशासन द्वारा की गई मारपीट ने उन्हें गहरे सदमे में डाल दिया। उन्होंने आरोप लगाया कि वृद्ध आचार्यों को पीटा गया और एक ब्राह्मण को जमीन पर गिराकर उसकी शिखा (चोटी) घसीटी गई—जो धार्मिक और सांस्कृतिक रूप से अत्यंत अपमानजनक है।
उन्होंने कहा कि शिखा संतों और आचार्यों की आस्था का प्रतीक है और इस पर आघात केवल व्यक्ति विशेष का नहीं, बल्कि धार्मिक भावनाओं का अपमान है। उनके अनुसार, ऐसी घटनाएं समाज में असमानता और भेदभाव को बढ़ावा देती हैं।
यूजीसी बिल पर आपत्ति
इस्तीफे में अलंकार अग्निहोत्री ने यूजीसी के प्रस्तावित नए कानून के प्रति भी अपना विरोध दर्ज कराया। उन्होंने संकेत दिया कि उच्च शिक्षा से जुड़े हालिया नीतिगत बदलाव उन्हें नैतिक और वैचारिक रूप से विचलित कर रहे हैं।
BHU से जुड़ाव ने बढ़ाई चर्चा
अलंकार अग्निहोत्री ने अपने पत्र में यह भी लिखा कि उन्हें आईआईटी (बीएचयू) से शिक्षा प्राप्त करने का सौभाग्य मिला। उन्होंने मदन मोहन मालवीय के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हुए कहा कि उनकी प्रेरणा से ही काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की स्थापना हुई।
उन्होंने अपने भाव व्यक्त करते हुए चिरंजीवी हनुमान जी का भी स्मरण किया और इस्तीफे को अंतःकरण की आवाज़ बताया।
प्रशासन से आगे, शिक्षा और संस्कृति तक बहस
अलंकार अग्निहोत्री का इस्तीफा अब केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं रह गया है। यूजीसी बिल, धार्मिक सम्मान और BHU जैसे प्रतिष्ठित शैक्षणिक संस्थान से जुड़ी उनकी भावनात्मक टिप्पणी ने इस मामले को शिक्षा, संस्कृति और शासन के व्यापक विमर्श में बदल दिया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि नीतिगत असहमति पर इस्तीफा देना दुर्लभ होता है, लेकिन शिक्षा और आस्था से जुड़ा संदर्भ इस प्रकरण को विशेष और प्रतीकात्मक बनाता है। यह देखना अहम होगा कि इस कदम का असर आने वाले समय में प्रशासनिक और शैक्षणिक नीतियों पर किस रूप में पड़ता है।
