नई दिल्ली। आवारा कुत्तों से जुड़ी याचिकाओं की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर बेहद व्यावहारिक और सख्त रुख अपनाया है। अदालत ने साफ कहा कि यह अंदाजा लगाना असंभव है कि कोई कुत्ता कब आक्रामक हो जाएगा या किसे काट लेगा। ऐसे में जन सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देना ही होगा।
जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस एन. वी. अंजारिया की पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि इस संवेदनशील मुद्दे पर भावनात्मक बहस के बजाय जमीनी सच्चाई को समझना जरूरी है।
“कैसे पता चलेगा कौन सा कुत्ता काटेगा?”
कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं से सीधा सवाल किया—
“यह कौन तय करेगा कि कौन सा कुत्ता शांत है और कौन आक्रामक? क्या कोई गारंटी ले सकता है कि वह कभी किसी को नुकसान नहीं पहुंचाएगा?”
अदालत ने कहा कि बच्चों, बुजुर्गों और आम नागरिकों की सुरक्षा से बड़ा कोई तर्क नहीं हो सकता।
गेटेड कम्युनिटी को मिले निर्णय का अधिकार
वरिष्ठ अधिवक्ता वंदना जैन की दलीलों पर टिप्पणी करते हुए कोर्ट ने कहा कि गेटेड सोसाइटी में आवारा कुत्तों को खुले में छोड़ा जाए या नहीं—इसका फैसला वहां रहने वाले लोगों को करना चाहिए।
कोर्ट ने उदाहरण देते हुए कहा,
“अगर 90 फीसदी लोग इसे बच्चों के लिए खतरनाक मानते हैं और 10 फीसदी समर्थन करते हैं, तो बहुमत की राय को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। कल कोई यह कहकर भैंस भी ले आए कि उसे दूध चाहिए।”
पीठ ने सुझाव दिया कि कानून में ऐसा प्रावधान होना चाहिए, जिससे गेटेड कम्युनिटी मतदान के जरिए यह निर्णय ले सके।
रेबीज का खतरा और बेकाबू हालात
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने देश में बढ़ते रेबीज मामलों पर गहरी चिंता जताई, खासकर दिल्ली और एनसीआर क्षेत्र को लेकर। कोर्ट के अनुसार हालात नियंत्रण से बाहर होते जा रहे हैं और इसे हल्के में नहीं लिया जा सकता।
अदालत ने स्पष्ट किया कि—
- स्कूल, अस्पताल और सरकारी संस्थान कुत्तों से पूरी तरह मुक्त होने चाहिए
- आक्रामक या रेबीज-संदिग्ध कुत्तों को दोबारा उसी इलाके में नहीं छोड़ा जाएगा
- सड़कों और सार्वजनिक स्थलों पर कुत्तों को खाना खिलाने की अनुमति नहीं होगी
शेल्टर होम बनें समाधान का केंद्र
सुप्रीम कोर्ट ने पशु प्रेमियों से अपील की कि वे सड़कों पर कुत्तों को भोजन कराने के बजाय शेल्टर होम में यह जिम्मेदारी निभाएं। साथ ही नगर निगमों को निर्देश दिए गए कि वे अलग-अलग फीडिंग स्पेस विकसित करें।
कोर्ट ने चेतावनी दी कि अगर कोई व्यक्ति या संगठन नगर निगम को कुत्ते पकड़ने से रोकेगा, तो उसके खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की जाएगी।
“यह केवल लापरवाही नहीं, सिस्टम की विफलता है”
पीठ ने इसे महज प्रशासनिक चूक नहीं बल्कि पूरे सिस्टम की नाकामी बताया। अदालत ने निर्देश दिए कि नगर निकाय नियमित जांच करें और यह सुनिश्चित करें कि किसी भी सार्वजनिक संस्थान में कुत्तों का जमावड़ा न हो।
गौरतलब है कि इससे पहले 18 दिसंबर 2025 की सुनवाई में भी सुप्रीम कोर्ट ने कुछ नियमों को “अमानवीय” कहे जाने पर नाराजगी जताते हुए सवाल किया था—
“आखिर मानवता है क्या?”
